जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम के पूरे वर्जन को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। इंडिया गठबंधन में शामिल कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच इस मुद्दे पर मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं। विवाद की शुरुआत एक सरकारी कार्यक्रम में वंदे मातरम के सभी छह अंतरों के गायन से हुई। कांग्रेस ने ऐतिहासिक परंपराओं और देश की विविधता का हवाला देते हुए इस पर सवाल खड़े किए, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने स्पष्ट किया कि सरकारी आयोजनों में निर्धारित नियमों का पालन होना चाहिए। इस बीच बीजेपी ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के रुख की सराहना करते हुए इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। वहीं पीडीपी ने संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की अंतरात्मा की आजादी का जिक्र किया है। इस तरह वंदे मातरम के पूरे वर्जन से जुड़ा राष्ट्रीय गीत का मुद्दा अब जम्मू-कश्मीर की सियासत में कांग्रेस, NC और बीजेपी के बीच नई बहस का केंद्र बन गया है।
कांग्रेस का कहना है कि ऐतिहासिक भावना को समझना जरूरी
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए वंदे मातरम विवाद पर पार्टी की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम के पूरे स्वरूप को लेकर फैसला करते समय उस दौर की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए, जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। उनके अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के कई बड़े नेताओं ने ऐसे स्वरूप को प्राथमिकता दी थी जिसे देश के अलग-अलग समुदाय आसानी से स्वीकार कर सकें। वेणुगोपाल ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू और दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों की सोच का हवाला दिया।
कांग्रेस नेता का तर्क है कि उस समय वंदे मातरम के कुछ चुनिंदा हिस्सों को इसलिए प्रमुखता दी गई थी, ताकि गीत को लेकर किसी तरह का धार्मिक या सांप्रदायिक विवाद पैदा न हो। कांग्रेस के मुताबिक आज भी भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वेणुगोपाल ने अपने सहयोगी दलों से भी अपील की कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय नेताओं ने जिस समझ और संतुलन के साथ इस गीत को अपनाया था, उसका सम्मान किया जाए। कांग्रेस इस पूरी बहस को देशभक्ति की कमी के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे उस संवैधानिक सोच से जोड़ रही है जिसके तहत अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों को बराबर सम्मान दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस ने भी रखा अपना पक्ष
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने भी पार्टी के इस रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि देश के राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय प्रतीक और दूसरी परंपराएं हर भारतीय के लिए भावनात्मक महत्व रखती हैं। लेकिन किसी राष्ट्रीय प्रतीक की ताकत तभी और बढ़ती है, जब वह देश में मौजूद अलग-अलग विचारों और संस्कृतियों को साथ लेकर चले। कर्रा ने कहा कि वंदे मातरम का इतिहास केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि आजाद भारत में भी इसके स्वरूप और इस्तेमाल को लेकर लगातार एक विकासक्रम रहा है।
कांग्रेस नेता के अनुसार देश में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ भारत की विविधता का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि राष्ट्रीय गीत या किसी अन्य राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर ऐसी स्थिति नहीं बननी चाहिए जिसमें देश का कोई वर्ग खुद को उससे अलग महसूस करे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देशभक्ति का अर्थ किसी एक तरीके से अपनी भावना व्यक्त करना नहीं है। उनके मुताबिक राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान तब ज्यादा मजबूत होता है जब वे भारत की अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक विविधताओं के लिए जगह बनाते हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के बयान से बनाई दूरी
कांग्रेस के रुख के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने में देर नहीं की। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने कहा कि NC ने इस मामले में अपना पुराना रुख नहीं बदला है। उन्होंने साफ किया कि पार्टी ने न तो दो अंतरों वाले वर्जन को अपनी ओर से कोई विशेष मान्यता दी है और न ही छह अंतरों वाले वर्जन को पार्टी के राजनीतिक विचार का हिस्सा बनाया है। हालांकि उनका कहना था कि सरकारी कार्यक्रमों के मामले में व्यक्तिगत और राजनीतिक राय से अलग नियमों का पालन करना जरूरी है।
तनवीर सादिक ने कहा कि किसी व्यक्ति को वंदे मातरम गाना है या नहीं, यह उसकी व्यक्तिगत इच्छा का विषय हो सकता है और किसी पर जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब किसी सरकारी आयोजन की बात आती है और वहां लागू नियम स्पष्ट होते हैं, तो सरकारी संस्थानों को उनका पालन करना पड़ता है। उन्होंने कांग्रेस से यह भी सवाल किया कि यदि पूरा गीत गाया जाना इतना बड़ा मुद्दा है, तो केवल जम्मू-कश्मीर में ही इसे लेकर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। उन्होंने दूसरे राज्यों में कांग्रेस की सरकारों के दौरान हुए ऐसे कार्यक्रमों का हवाला देते हुए पूछा कि वहां इस विषय को लेकर ऐसी आपत्ति क्यों नहीं जताई गई।
NC का कहना है कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर की राजनीति को निशाना बनाने से पहले अपने राज्यों में अपनाए गए रवैये पर भी नजर डालनी चाहिए। पार्टी ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उसके लिए सरकारी जिम्मेदारी और राजनीतिक विचारधारा दो अलग-अलग चीजें हैं। यही अंतर अब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच दिखाई दे रहा है।
BJP ने उमर अब्दुल्ला और NC की तारीफ की
कांग्रेस और NC के बीच पैदा हुए इस मतभेद पर बीजेपी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। बीजेपी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के रुख का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला की तारीफ की। उन्होंने कहा कि आधिकारिक कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत के दौरान सम्मान के तौर पर खड़े होना एक महत्वपूर्ण संदेश है। बीजेपी ने इसे कांग्रेस के लिए राजनीतिक जवाब बताते हुए दावा किया कि राष्ट्रीय प्रतीकों के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन के भीतर ही अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं।
अल्ताफ ठाकुर ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थानों के मामले में असहज रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की जनता राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर किसी तरह की नकारात्मक राजनीति स्वीकार नहीं करेगी। बीजेपी नेता ने NC के कदम को कांग्रेस के लिए झटका बताया और कहा कि इससे यह साफ होता है कि गठबंधन के सभी दल राष्ट्रीय प्रतीकों को एक ही नजर से नहीं देखते। बीजेपी के इस बयान ने विवाद को और राजनीतिक रंग दे दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में उमर अब्दुल्ला की भूमिका खास तौर पर चर्चा में आ गई है। एक तरफ कांग्रेस वंदे मातरम के पूरे वर्जन को लेकर ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्क दे रही है, वहीं NC के नेतृत्व वाली जम्मू-कश्मीर सरकार सरकारी कार्यक्रमों में लागू नियमों का पालन करने की बात कह रही है। यही वजह है कि बीजेपी लगातार उमर अब्दुल्ला के रुख को कांग्रेस के खिलाफ उदाहरण के तौर पर पेश कर रही है।
PDP ने कहा- देशभक्ति का फैसला केवल खड़े होने से नहीं होता
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस विवाद में एक अलग दृष्टिकोण रखा है। PDP के मुख्य प्रवक्ता सैयद तजामुल इस्लाम ने संविधान में दिए गए अधिकारों और व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि किसी नागरिक की देशभक्ति का फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह वंदे मातरम गाते समय खड़ा हुआ या नहीं। उनके मुताबिक राष्ट्रीय गीत का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार भी महत्वपूर्ण हैं।
PDP नेता ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के बैठने या खड़े रहने को देशभक्ति और देशद्रोह का पैमाना बनाना सही नहीं होगा। उनका कहना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में लोगों के सोचने और अपनी भावनाएं व्यक्त करने के तरीके अलग हो सकते हैं। सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान दिखाना सामान्य बात है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हर नागरिक की देशभक्ति को एक ही कसौटी पर परखा जाए। PDP ने इस बहस को राजनीतिक टकराव के बजाय संवैधानिक अधिकारों के नजरिए से देखने की जरूरत बताई है।
INDIA गठबंधन के भीतर मतभेद हुए उजागर
वंदे मातरम का पूरा वर्जन गाए जाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच व्यापक राजनीतिक मतभेद की ओर इशारा कर रहा है। दोनों दल राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इस मुद्दे पर दोनों की सोच अलग दिखाई दे रही है। कांग्रेस इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, धर्मनिरपेक्षता और भारत की विविधता से जोड़ रही है, जबकि NC सरकारी कार्यक्रमों में लागू नियमों और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर जोर दे रही है।
इस बीच एक आधिकारिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला को वंदे मातरम के गायन के दौरान सम्मान में खड़े देखा गया। इस घटनाक्रम को बीजेपी ने कांग्रेस के लिए जवाब के तौर पर पेश किया। वहीं कांग्रेस का तर्क अभी भी यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के साथ-साथ देश की विविध सामाजिक संरचना को ध्यान में रखना जरूरी है। इस तरह दोनों सहयोगी दलों के बीच मतभेद केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सार्वजनिक रूप से भी दिखाई देने लगे हैं।
वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रगीत है। इसके सम्मान को लेकर देश में व्यापक भावना मौजूद है, लेकिन इसके अलग-अलग अंतरों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इनके इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर बहस भी होती रही है। मौजूदा विवाद में कानूनी नियम, राजनीतिक विचारधारा, संविधान में मिले अधिकार और देशभक्ति की अभिव्यक्ति जैसे कई मुद्दे एक साथ सामने आ गए हैं। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर में शुरू हुई यह बहस अब राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन रही है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस एक ही गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद वंदे मातरम के पूरे वर्जन को लेकर अलग-अलग रुख अपना रहे हैं। कांग्रेस ऐतिहासिक संदर्भ और समावेशी सोच पर जोर दे रही है, जबकि NC सरकारी आयोजनों में लागू नियमों के पालन की बात कर रही है। बीजेपी ने NC के रुख का स्वागत किया है और इसे कांग्रेस के लिए राजनीतिक संदेश बताया है। दूसरी ओर PDP ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को बहस के केंद्र में रखा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वंदे मातरम विवाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति और INDIA गठबंधन के रिश्तों पर कितना असर डालता है।
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