Monday, February 16, 2026

TRENDING POSTS

latest posts

Homeबिज़नेसRBI ब्रोकर्स फंडिंग नियम 2026: सख्त दिशानिर्देशों से स्टॉक ब्रोकिंग उद्योग में...

RBI ब्रोकर्स फंडिंग नियम 2026: सख्त दिशानिर्देशों से स्टॉक ब्रोकिंग उद्योग में बड़ा बदलाव

भारतीय शेयर बाजार में काम करने वाले स्टॉक ब्रोकर्स के लिए 1 अप्रैल 2026 से एक नया दौर शुरू होने जा रहा है। Reserve Bank of India (RBI) ने ब्रोकर्स को मिलने वाली फंडिंग और उससे जुड़े कोलेटरल नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इन नियमों का सीधा असर ब्रोकर्स के बिजनेस मॉडल, उनकी पूंजी जरूरतों और बैंकों के साथ उनके रिश्तों पर पड़ेगा। RBI ब्रोकर्स फंडिंग नियम 2026 का उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में अनावश्यक जोखिम को कम करना और बाजार को ज्यादा सुरक्षित बनाना है।

बीते कुछ वर्षों में कैपिटल मार्केट तेजी से बढ़ा है। ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ-साथ ब्रोकर्स की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। कई ब्रोकर्स बैंक गारंटी और आंशिक रूप से असुरक्षित फंडिंग के जरिए अपने कारोबार का दायरा बढ़ा रहे थे। इससे बाजार में लीवरेज बढ़ता जा रहा था, जो किसी भी अस्थिर स्थिति में गंभीर जोखिम पैदा कर सकता था। इसी जोखिम को देखते हुए RBI ने सख्त कदम उठाए हैं।

केवल पूरी तरह सुरक्षित फंडिंग की अनुमति

नए नियमों के अनुसार अब स्टॉक ब्रोकर्स को मिलने वाली फंडिंग पूरी तरह सुरक्षित होनी चाहिए। पहले बैंकों की ओर से दी जाने वाली गारंटी में कुछ हिस्सा सुरक्षित संपत्तियों से कवर किया जाता था और बाकी हिस्सा व्यक्तिगत या कॉरपोरेट गारंटी पर आधारित होता था। अब इस तरह की ढीली व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है।

अब हर ब्रोकर्स को जितनी फंडिंग चाहिए, उसके बदले उतनी ही मूल्य की ठोस गिरवी देनी होगी। इसका मतलब है कि ब्रोकर्स को अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा कोलेटरल के रूप में लॉक करना पड़ेगा। इससे खासकर छोटे और मध्यम स्तर के ब्रोकर्स पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि उनके पास सीमित पूंजी होती है।

बैंक गारंटी और कोलेटरल पर सख्त शर्तें

RBI ने एक्सचेंज और क्लियरिंग कॉरपोरेशन के पक्ष में जारी की जाने वाली बैंक गारंटी के नियमों को भी पहले से ज्यादा कड़ा बना दिया है। नए प्रावधानों के अनुसार ब्रोकर्स को कम से कम 50% कोलेटरल देना अनिवार्य होगा। इस कोलेटरल का एक बड़ा हिस्सा, यानी कम से कम 25%, नकद या नकद के बराबर सुरक्षित साधनों में होना चाहिए।

अगर ब्रोकर्स शेयरों को गिरवी रखते हैं, तो उन पर कम से कम 40% का हेयरकट लागू किया जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि शेयरों की बाजार कीमत से काफी कम वैल्यू पर ही उन्हें फंडिंग के लिए स्वीकार किया जाएगा। यह व्यवस्था इसलिए लाई गई है ताकि शेयरों की कीमत में तेज गिरावट होने पर भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को बड़ा नुकसान न हो।

प्रोप्रायटरी ट्रेडिंग के लिए बैंक फंडिंग पर रोक

RBI ब्रोकर्स फंडिंग नियम 2026 के तहत अब बैंकों को ब्रोकर्स की प्रोप्रायटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग देने की अनुमति नहीं होगी। प्रोप्रायटरी ट्रेडिंग में ब्रोकर्स अपने खुद के पैसे से शेयरों और अन्य वित्तीय साधनों में निवेश करते हैं। यह गतिविधि उच्च जोखिम वाली मानी जाती है और इससे बैंकों की पूंजी पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि, कुछ सीमित कार्यों जैसे मार्केट मेकिंग और डेट वेयरहाउसिंग को इससे अलग रखा गया है। इसके अलावा, इन गतिविधियों से जुड़ी फंडिंग को अब कैपिटल मार्केट एक्सपोजर माना जाएगा। इससे बैंकों की कुल लोन सीमा पर प्रभाव पड़ेगा और वे इस सेक्टर में कर्ज देने से पहले ज्यादा सावधानी बरतेंगे।

ब्रोकर्स के खर्च बढ़ेंगे, लीवरेज होगा कम

नए नियमों के लागू होने से बाजार में जरूरत से ज्यादा लीवरेज लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे शेयर बाजार में स्थिरता आएगी और जोखिम का स्तर कम होगा। लेकिन दूसरी ओर, ब्रोकर्स के लिए पूंजी जुटाना पहले की तुलना में महंगा हो सकता है। बैंक गारंटी की लागत बढ़ सकती है और पर्याप्त कोलेटरल की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

छोटे ब्रोकर्स के लिए यह स्थिति ज्यादा कठिन हो सकती है, क्योंकि उनके पास बड़े ब्रोकर्स की तरह मजबूत बैलेंस शीट नहीं होती। बड़े ब्रोकर्स हालांकि इन बदलावों के साथ खुद को ढालने की बेहतर स्थिति में हो सकते हैं।

निवेशकों और पूरे बाजार पर असर

निवेशकों के लिए ये नियम लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जब ब्रोकर्स की फंडिंग और जोखिम लेने की क्षमता पर सख्त नियंत्रण होगा, तो उनके अचानक संकट में फंसने की संभावना कम हो जाएगी। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और बाजार में पारदर्शिता आएगी।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, RBI द्वारा किए गए ये बदलाव भारतीय शेयर बाजार को ज्यादा सुरक्षित और संतुलित बनाने की दिशा में एक अहम कदम हैं। 100% सिक्योर्ड फंडिंग, सख्त कोलेटरल नियम और प्रोप्रायटरी ट्रेडिंग पर रोक से वित्तीय प्रणाली में जोखिम कम होगा। भले ही शुरुआत में ब्रोकर्स को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़े, लेकिन लंबे समय में ये सुधार बाजार की मजबूती और स्थिरता के लिए फायदेमंद साबित होंगे।

ये भी पढ़े

AI एजेंट वर्कफोर्स: StackBlitz की रणनीति से बदलता टेक कंपनियों का हायरिंग सिस्टम

डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में मजबूती: सरकार की आमदनी बढ़ी, अर्थव्यवस्था को मिला नया भरोसा

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments