Monday, February 23, 2026

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सूर्य देव की पौराणिक कथा: जब शिव के प्रकोप से कुछ समय के लिए थम गया था संसार का उजाला

सूर्य देव की पौराणिक कथा:जब शिव के प्रकोप से कुछ समय के लिए थम गया था संसार का उजालासनातन संस्कृति में भगवान सूर्य को जीवन का आधार माना गया है। धरती पर मौजूद हर प्राणी सूर्य की रोशनी और ऊष्मा से ही जीवित रहता है। इसलिए हिंदू धर्म में सूर्य देव को केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि ऊर्जा, आरोग्य, तेज और आत्मबल के देवता के रूप में पूजा जाता है। शास्त्रों और पुराणों में सूर्य देव से जुड़ी अनेक कथाएं वर्णित हैं, जो मनुष्य को सही आचरण और संयम का मार्ग दिखाती हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान शिव और सूर्य देव से संबंधित है, जिसमें शिव जी के क्रोध के कारण कुछ समय के लिए पूरी सृष्टि अंधकार में डूब गई थी।

यह कथा हमें यह समझाती है कि देवताओं के कार्यों का प्रभाव भी पूरे जगत पर पड़ता है। साथ ही यह प्रसंग मानव जीवन के लिए धैर्य और विवेक का संदेश देता है। आइए जानते हैं विस्तार से सूर्य देव और भगवान शिव की पौराणिक कथा

रविवार और सूर्य देव की पूजा का धार्मिक महत्व

हिंदू परंपरा में सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है। रविवार का दिन भगवान सूर्य देव को अर्पित माना गया है। इस दिन प्रातःकाल सूर्य को जल अर्पित करने, सूर्य नमस्कार करने और व्रत रखने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि रविवार को श्रद्धा से सूर्य देव की उपासना करने से शरीर स्वस्थ रहता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

ज्योतिष के अनुसार सूर्य ग्रह आत्मबल, मान-सम्मान, नेतृत्व क्षमता और सरकारी क्षेत्र में सफलता का प्रतीक है। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य कमजोर होता है, उन्हें रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा करने से लाभ मिलता है। इससे व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में स्थिरता आती है।

पुराणों में वर्णित सूर्य देव और शिव जी की कथा

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन समय में माली और सुमाली नाम के दो असुर थे। वे अत्यंत पराक्रमी थे, लेकिन अहंकार के कारण उनके व्यवहार में कठोरता आ गई थी। किसी प्रसंग में उनका सूर्य देव से टकराव हो गया, जिससे वे सूर्य देव के तेज से आहत हो गए। इस घटना के बाद दोनों असुरों के शरीर में असहनीय पीड़ा उत्पन्न हो गई। अनेक उपाय करने के बावजूद उनकी वेदना कम नहीं हुई।

पीड़ा से त्रस्त होकर दोनों असुर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। उन्होंने कैलाश पर्वत पर जाकर भोलेनाथ के सामने अपनी व्यथा प्रकट की और सूर्य देव के कारण हुए अपमान का उल्लेख किया। उनकी दशा देखकर भगवान शिव का हृदय द्रवित हो उठा।

शिव जी का आवेश और सूर्य देव पर प्रहार

असुरों की पीड़ा सुनकर भगवान शिव को सूर्य देव पर क्रोध आ गया। भोलेनाथ करुणा के सागर हैं, लेकिन जब उन्हें किसी के साथ अन्याय होता प्रतीत होता है, तो उनका रौद्र रूप भी प्रकट हो जाता है। आवेश में आकर उन्होंने अपने त्रिशूल से सूर्य देव पर प्रहार कर दिया।

शिव जी के प्रहार से सूर्य देव अपने रथ से नीचे गिर पड़े। सूर्य का तेज क्षीण होते ही धरती पर प्रकाश मंद पड़ गया। दिन में भी अंधकार जैसा वातावरण बन गया। पेड़-पौधों की वृद्धि रुकने लगी, पक्षी विचलित हो गए और मानव जीवन में भय का वातावरण उत्पन्न हो गया। पूरी सृष्टि पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा।

कश्यप ऋषि का शोक और भावुक क्षण

जब महर्षि कश्यप को अपने पुत्र सूर्य देव की पीड़ा का समाचार मिला, तो वे अत्यंत दुखी हो गए। पुत्र के कष्ट को देखकर उनका मन वेदना से भर उठा। भावनाओं में बहकर उन्होंने भगवान शिव को श्राप दे दिया कि उन्हें भी संतान वियोग का दुख झेलना पड़ेगा। यही श्राप आगे चलकर गणेश जी की कथा से जुड़ा माना जाता है, जब शिव जी को अपने ही पुत्र से दूर होना पड़ा।

यह प्रसंग बताता है कि अत्यधिक भावुकता में लिया गया निर्णय कभी-कभी बड़े परिणाम लेकर आता है।

शिव जी का पश्चाताप और सूर्य देव को पुनः तेज

जब भगवान शिव ने देखा कि सूर्य देव के बिना संसार का संतुलन बिगड़ रहा है और सृष्टि संकट में पड़ गई है, तब उनका क्रोध शांत हुआ। भोलेनाथ को अपने कृत्य का परिणाम समझ में आया। उन्होंने अपने दिव्य सामर्थ्य से सूर्य देव को पुनः जीवन और तेज प्रदान किया।

सूर्य देव फिर से अपने रथ पर विराजमान हुए और संसार में उजाले का प्रसार हुआ। धरती पर जीवन की ऊर्जा लौट आई। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सृष्टि के संतुलन के लिए करुणा और विवेक अत्यंत आवश्यक हैं।

असुरों को मिला भक्ति का मार्ग

इस पूरी घटना के बाद ब्रह्मा जी ने माली और सुमाली को समझाया कि देवताओं से द्वेष रखने से केवल दुख ही प्राप्त होता है। उन्होंने उन्हें सूर्य देव की उपासना का मार्ग दिखाया। दोनों असुरों ने श्रद्धापूर्वक सूर्य देव की पूजा की। सूर्य देव की कृपा से उनकी शारीरिक पीड़ा समाप्त हो गई और वे सामान्य जीवन की ओर लौट आए।

निष्कर्ष

सूर्य देव और भगवान शिव की यह पौराणिक कथा हमें यह सिखाती है कि क्रोध में लिया गया निर्णय पूरे संसार को प्रभावित कर सकता है। वहीं करुणा, पश्चाताप और भक्ति से बड़ी से बड़ी भूल को भी सुधारा जा सकता है। रविवार के दिन सूर्य देव की उपासना करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, स्वास्थ्य और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: रविवार को सूर्य देव की पूजा का क्या महत्व है?
उत्तर: रविवार सूर्य देव को समर्पित होता है। इस दिन पूजा करने से आरोग्य, तेज और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

प्रश्न 2: सूर्य देव की उपासना से जीवन में क्या लाभ मिलता है?
उत्तर: सूर्य देव की पूजा से स्वास्थ्य अच्छा रहता है, मान-सम्मान बढ़ता है और करियर में स्थिरता आती है।

प्रश्न 3: भगवान शिव ने सूर्य देव पर प्रहार क्यों किया था?
उत्तर: माली और सुमाली असुरों की पीड़ा सुनकर शिव जी आवेश में आ गए थे।

प्रश्न 4: सूर्य देव के रथ से गिरने पर क्या हुआ?
उत्तर: सूर्य का तेज कम होते ही संसार में अंधकार फैल गया और जीवन संकट में पड़ गया।

प्रश्न 5: इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर: यह कथा हमें संयम, धैर्य और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

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