भारत में दवाओं की उपलब्धता और उनकी कीमतों को लेकर हमेशा से चर्चा होती रही है, लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा किए गए एक नए बड़े कदम ने पूरे फार्मा सेक्टर में चिंता बढ़ा दी है। सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण कच्चे माल पर न्यूनतम आयात मूल्य (Minimum Import Price – MIP) लागू करने की तैयारी कर ली है। इस निर्णय का सीधा असर यह होगा कि दवाएं बनाने का खर्च बढ़ सकता है, और इसी वजह से दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे सामान्य मरीजों तक पहुंचने वाली दवाएं महंगी होने की आशंका बढ़ गई है। कई विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो आने वाले महीनों में दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मध्यम और गरीब परिवारों की जेब पर भारी बोझ पड़ेगा।
भारतीय दवा कंपनियां अब भी कई अहम कच्चे माल—खासकर API जो एंटीबायोटिक दवाओं में इस्तेमाल होता है—विदेशों से मंगवाती हैं। इनमें चीन सबसे बड़ा स्रोत है। जब सरकार आयातित सामान पर MIP लागू करती है, तो कंपनियों को कच्चा माल पहले से ज्यादा महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। यह बढ़ी हुई लागत दवाओं के उत्पादन में सीधे जुड़ जाती है और परिणामस्वरूप दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। बड़ी कंपनियां तो किसी तरह लागत का भार संभाल सकती हैं, लेकिन छोटे और मझोले उद्योग यानी MSME के लिए यह खर्चा भारी साबित हो सकता है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से हजारों छोटी दवा फैक्ट्रियों की हालत खराब हो सकती है और फार्मा MSME सेक्टर पर बड़ा झटका लग सकता है, जिसके कारण दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
सरकार इस समय पेनिसिलिन-G, 6APA और एमोक्सिसिलिन जैसे महत्वपूर्ण इनपुट के लिए MIP तय करने पर विचार कर रही है। ये वे तत्व हैं जिनके बिना एंटीबायोटिक दवाओं का उत्पादन संभव नहीं है। इसलिए, अगर इनकी लागत बढ़ेगी, तो कंपनियों पर दबाव और भी बढ़ेगा और फिर दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, विशेष रूप से वे दवाएं जो आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी हैं।
इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार यदि MIP लागू होता है, तो देश भर में 10,000 से अधिक MSME फार्मा यूनिट्स प्रभावित हो सकती हैं, जिनमें से कई को अपने संचालन बंद करने पड़ सकते हैं। यह स्थिति आगे बढ़ी तो लगभग 2 लाख लोगों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है। छोटे उद्योग पहले ही महामारी के बाद की आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, और ऐसे में नई नीति से उनकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। जैसे-जैसे उत्पादन लागत बढ़ेगी, वैसे-वैसे दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे कंपनियां भी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना मुश्किल समझेंगी।
कुछ महीनों पहले सरकार ने ATS-8 पर 111 डॉलर प्रति किलो का MIP लागू किया था और फिर सल्फाडायजीन के लिए भी 1,174 रुपये प्रति किलो का MIP तय किया गया। इन फैसलों ने पहले ही दवा कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। अब यदि और कच्चे माल को MIP के दायरे में शामिल किया गया, तो पूरा दवा बाजार प्रभावित हो सकता है और नतीजतन दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।
हालांकि कई विशेषज्ञ इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोग इसे एक सकारात्मक कदम भी मानते हैं। उनका कहना है कि भारत लंबे समय से कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है और यह निर्भरता लंबे समय में देश की दवा सुरक्षा को कमजोर करती है। इस नजरिए से देखा जाए तो सरकार का यह कदम आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है। अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो भविष्य में दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं जैसी चिंताएं भी कम हो सकती हैं।
PLI (Production-Linked Incentive) योजना का उद्देश्य भी यही था कि दवाओं में इस्तेमाल होने वाला महत्वपूर्ण API भारत में ही बनाया जाए ताकि लागत कम हो और लंबे समय में दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं जैसी स्थिति न बने।
कई जानकारों का कहना है कि MIP का उपयोग PLI स्कीम के उद्देश्य से बिल्कुल मेल नहीं खाता। उनका मानना है कि इस तरह के कदम यह संकेत दे सकते हैं कि PLI का लाभ लेने वाली कंपनियां स्कीम के बाहर भी अतिरिक्त सुरक्षा चाहती हैं। इससे उद्योग में असमानता पैदा हो सकती है और छोटे निर्माता बाज़ार में टिक नहीं पाएंगे। अगर निर्माण लागत बढ़ती रही तो बिना किसी संदेह के दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे जनता की परेशानियां और बढ़ेंगी।
भारत में बड़ी आबादी ऐसे परिवारों की है जिनकी आय सीमित है और वे महंगी दवाएं नहीं खरीद पाते। ऐसी स्थिति में यदि सामान्य दवाएं भी महंगी हो जाएं, तो मरीजों और उनके परिवारों पर बड़ा आर्थिक दबाव पड़ेगा। यही कारण है कि लोग लगातार चिंता जता रहे हैं कि इस फैसले से दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, और इससे आम लोगों की परेशानी कई गुना बढ़ जाएगी।
देश के लिए यह बेहद संवेदनशील स्थिति है क्योंकि दवा नीति केवल उद्योग को प्रभावित नहीं करती, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ी होती है। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार उद्योग विशेषज्ञों, MSME यूनिट्स और आर्थिक विश्लेषकों से चर्चा करके ऐसा समाधान निकाले जिसमें भारत आत्मनिर्भर भी बने, उद्योग भी सुरक्षित रहे और साथ ही दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं जैसी चिंताएं भी कम हों।https://www.livehindustan.com/business/pharma-stocks-surge-after-good-news-on-drug-tariffs
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