भारत में बढ़ती महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर एक बड़ा और समझदारी भरा कदम उठाया है। “रूसी तेल आयात” अब भारत की ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा बन चुका है। मिडल ईस्ट में चल रहे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। ऐसे माहौल में भारत ने समय रहते अपनी रणनीति बदलकर रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है।
मिडल ईस्ट संकट के बीच भारत की तैयारी
मध्य पूर्व क्षेत्र लंबे समय से दुनिया के प्रमुख तेल आपूर्ति केंद्रों में शामिल रहा है। लेकिन हाल के तनाव और संघर्षों ने इस क्षेत्र की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे हालात में तेल सप्लाई में रुकावट का खतरा बढ़ जाता है। भारत ने इस जोखिम को समझते हुए पहले से तैयारी शुरू कर दी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने अगले महीने के लिए लगभग 6 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदने का निर्णय लिया है। यह कदम देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और अचानक बढ़ती कीमतों से राहत दिलाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
प्रीमियम कीमत पर भी खरीद का फैसला
इस बार भारत ने रूस से तेल खरीदते समय पारंपरिक छूट का इंतजार नहीं किया, बल्कि जरूरत को प्राथमिकता दी। जानकारी के मुताबिक, यह तेल ब्रेंट क्रूड की तुलना में 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा कीमत पर खरीदा गया है। इसके बावजूद भारत ने यह सौदा इसलिए किया क्योंकि मौजूदा समय में ऊर्जा की निरंतर उपलब्धता सबसे जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खरीदारी पहले के मुकाबले काफी अधिक है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत ने अपनी ऊर्जा नीति में तेजी से बदलाव किया है और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भंडारण बढ़ा रहा है।
अमेरिकी छूट से मिला बड़ा सहयोग
भारत की इस रणनीति में अमेरिका की ओर से दी गई छूट ने भी अहम भूमिका निभाई है। अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को खरीदने की अनुमति दी थी, जो पहले ही जहाजों में लोड हो चुके थे। इसके बाद इस अनुमति की अवधि को आगे बढ़ा दिया गया, जिससे भारत को अतिरिक्त समय मिल गया।
यह राहत उस समय मिली जब होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट की स्थिति बनी हुई थी, जो वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इस फैसले से भारत को संकट के समय में बड़ी राहत मिली और उसने अपने भंडार को मजबूत किया।
रिफाइनरियों की वापसी से बढ़ी मजबूती
देश की प्रमुख रिफाइनरियां जैसे मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी लिमिटेड, जो कुछ समय पहले रूसी तेल से दूरी बना चुकी थीं, अब फिर से सक्रिय हो गई हैं। इन रिफाइनरियों की वापसी से भारत की कुल उत्पादन क्षमता में सुधार हुआ है।
इससे यह साफ है कि भारत ने परिस्थितियों के अनुसार अपने फैसले बदले हैं और सही समय पर सही दिशा में कदम उठाया है। रिफाइनरियों के सक्रिय होने से देश में पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति स्थिर रहने की संभावना बढ़ गई है।
सप्लाई के लिए कई देशों पर फोकस
भारत की रणनीति सिर्फ एक देश पर निर्भर रहने की नहीं है। यही कारण है कि वह रूस के अलावा अन्य देशों से भी तेल खरीद बढ़ा रहा है। खासतौर पर वेनेजुएला से तेल आयात में तेजी देखने को मिल रही है।
अनुमान के अनुसार, भारत अप्रैल महीने में लगभग 80 लाख बैरल वेनेजुएला का तेल खरीद सकता है, जो पिछले कई वर्षों में सबसे अधिक होगा। यह दिखाता है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा के लिए मल्टी-सोर्स नीति पर काम कर रहा है।
रूस को भी हो रहा बड़ा फायदा
भारत की बढ़ती खरीद का सीधा लाभ रूस को भी मिल रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने एशियाई बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। भारत जैसे बड़े ग्राहक की वजह से रूस की तेल आय में अच्छा इजाफा हुआ है।
ऊंची कीमतों और लगातार मांग के कारण रूस को आर्थिक रूप से मजबूती मिली है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध और गहरे हो रहे हैं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, “रूसी तेल आयात” भारत के लिए मौजूदा वैश्विक संकट में एक प्रभावी रणनीति के रूप में सामने आया है। इससे देश में ईंधन की उपलब्धता बनी रहेगी और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही, अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि भविष्य में किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम हो।
भारत की यह दूरदर्शी नीति आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत बनाएगी और वैश्विक स्तर पर देश की स्थिति को बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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