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कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा U-टर्न: IEA के कदम से अचानक गिर गए क्रूड ऑयल के दाम

वैश्विक ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों से काफी हलचल देखने को मिल रही थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और ईरान से जुड़ी खबरों ने तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी थी। निवेशकों को यह डर था कि अगर मध्य-पूर्व क्षेत्र में स्थिति और बिगड़ती है तो दुनिया भर में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी आशंका के कारण लगातार कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही थी और क्रूड ऑयल के दाम ऊंचाई पर पहुंच गए थे।

हालांकि बुधवार को बाजार में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला। जिस रफ्तार से क्रूड ऑयल के दाम बढ़ रहे थे, उसी तेजी से उनमें गिरावट भी दर्ज हुई। विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट की मुख्य वजह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) द्वारा लिया गया वह प्रस्ताव है, जिसके तहत संगठन अपने रणनीतिक भंडार से बड़ी मात्रा में तेल बाजार में जारी करने पर विचार कर रहा है। इस खबर के सामने आते ही वैश्विक बाजार में प्रतिक्रिया शुरू हो गई और तेल की कीमतों पर दबाव दिखाई देने लगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट

ताजा आंकड़ों के अनुसार बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत में हल्की गिरावट देखी गई और यह करीब 87.57 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। दूसरी ओर अमेरिकी मानक माने जाने वाले WTI क्रूड ऑयल फ्यूचर्स की कीमत भी कमजोर हुई और यह लगभग 83.08 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करती दिखाई दी।

तेल बाजार में रात के कारोबार के दौरान और भी तेज गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्टों के अनुसार ब्रेंट और WTI क्रूड के फ्रंट-मंथ फ्यूचर्स में लगभग 11 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई। यह पिछले चार वर्षों में एक ही दिन में दर्ज की गई सबसे बड़ी गिरावटों में से एक मानी जा रही है।

विश्लेषकों का मानना है कि जैसे ही बाजार को संकेत मिला कि आने वाले समय में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है, निवेशकों ने तुरंत अपने फैसले बदल दिए। ज्यादा सप्लाई की संभावना आमतौर पर कीमतों को नीचे लाती है और यही कारण है कि कच्चे तेल के दाम अचानक कमजोर पड़ गए।

IEA की आपात बैठक और बड़ा प्रस्ताव

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने हाल ही में अपने सदस्य देशों के ऊर्जा अधिकारियों के साथ एक आपात बैठक आयोजित की थी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य वैश्विक बाजार में बढ़ती क्रूड ऑयल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उपाय तलाशना था।

बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि संगठन अपने रणनीतिक भंडार से बड़ी मात्रा में तेल जारी कर सकता है। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मात्रा 182 मिलियन बैरल से भी अधिक हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह इतिहास का सबसे बड़ा समन्वित तेल रिलीज माना जाएगा।

इस कदम का मकसद स्पष्ट है — वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना ताकि अचानक बढ़ती कीमतों को काबू में रखा जा सके और ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनी रहे।

सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी

हालांकि इस योजना को लागू करना इतना आसान नहीं है। IEA के नियमों के अनुसार संगठन के सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। यदि किसी एक सदस्य देश ने भी इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई तो इसे फिलहाल रोका भी जा सकता है।

इसलिए अब बाजार की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि सदस्य देश इस प्रस्ताव को कितना समर्थन देते हैं और क्या वास्तव में इतनी बड़ी मात्रा में तेल बाजार में जारी किया जाएगा।

पहले भी लिया जा चुका है ऐसा फैसला

इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब IEA ने तेल भंडार से तेल जारी करने का निर्णय लिया हो। इससे पहले वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता देखी गई थी। उस समय भी तेल की आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए सदस्य देशों ने मिलकर दो बार बाजार में तेल जारी किया था।

उस फैसले से बाजार में अस्थायी राहत देखने को मिली थी और तेल की कीमतों में कुछ हद तक स्थिरता आई थी। इसी अनुभव के आधार पर विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में भी ऐसा कदम तेल बाजार को संतुलित करने में मददगार साबित हो सकता है।

क्या है इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण संगठन है। इसका मुख्यालय फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित है। इस संस्था की स्थापना वर्ष 1974 में की गई थी, जब दुनिया को बड़े तेल संकट का सामना करना पड़ा था।

IEA का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया भर में ऊर्जा की आपूर्ति सुरक्षित और स्थिर बनी रहे। जब भी वैश्विक स्तर पर तेल या ऊर्जा की आपूर्ति में संकट की स्थिति पैदा होती है, यह संगठन सदस्य देशों के साथ मिलकर समाधान तलाशने का काम करता है।

इसके अलावा यह संस्था ऊर्जा नीतियों पर शोध करती है, ऊर्जा बाजार का विश्लेषण करती है और स्वच्छ ऊर्जा के विकास को भी बढ़ावा देती है।

IEA के सदस्य देश और भारत की भूमिका

वर्तमान समय में IEA के 32 सदस्य देश हैं। इनमें अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा जैसे विकसित देश प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन देशों का वैश्विक ऊर्जा नीति में बड़ा प्रभाव माना जाता है।

इसके अलावा भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे बड़े देश इस संगठन के सहयोगी साझेदार के रूप में जुड़े हुए हैं। हाल के समय में यह चर्चा भी सामने आई है कि भारत को जल्द ही IEA की पूर्ण सदस्यता मिल सकती है

सूत्रों के अनुसार सदस्य देशों ने ब्राजील, कोलंबिया, भारत और वियतनाम को संगठन में शामिल करने पर सकारात्मक संकेत दिए हैं। यदि यह प्रक्रिया पूरी होती है तो ऊर्जा नीति से जुड़े वैश्विक निर्णयों में भारत की भागीदारी और मजबूत हो सकती है।

मध्य-पूर्व के तनाव का असर

दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल उत्पादन के लिए मध्य-पूर्व क्षेत्र पर निर्भर है। इसलिए जब भी इस क्षेत्र में युद्ध या राजनीतिक तनाव की स्थिति बनती है तो उसका सीधा असर कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों पर दिखाई देता है।

हाल के दिनों में अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़ी खबरों ने बाजार में चिंता बढ़ा दी थी। निवेशकों को लग रहा था कि अगर इस क्षेत्र में हालात और खराब हुए तो तेल की सप्लाई बाधित हो सकती है। यही वजह थी कि कुछ दिनों पहले तक क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी बनी हुई थी।

एक सोशल मीडिया पोस्ट से बढ़ा उतार-चढ़ाव

तेल बाजार में अस्थिरता उस समय और बढ़ गई जब अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट की एक सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में आ गई। उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि अमेरिकी नौसेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक तेल टैंकर को सुरक्षित निकाल लिया है।

यह खबर सामने आते ही बाजार में हलचल बढ़ गई और निवेशकों ने तेजी से प्रतिक्रिया दी। हालांकि कुछ ही समय बाद यह पोस्ट हटा दी गई और व्हाइट हाउस की ओर से कहा गया कि ऐसा कोई अभियान हुआ ही नहीं था।

इस घटनाक्रम के कारण बाजार में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और तेज हो गया।

आगे तेल बाजार की दिशा क्या होगी

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि IEA वास्तव में अपने रणनीतिक भंडार से बड़ी मात्रा में तेल बाजार में जारी करता है तो आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है।

इसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है, हालांकि यह पूरी तरह वैश्विक मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार इस समय बेहद संवेदनशील स्थिति में है और क्रूड ऑयल की कीमतें वैश्विक घटनाओं के अनुसार तेजी से बदल सकती हैं।

Q1. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट क्यों आई?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का मुख्य कारण इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) द्वारा अपने रणनीतिक तेल भंडार से बड़ी मात्रा में तेल बाजार में जारी करने का प्रस्ताव है। इससे सप्लाई बढ़ने की संभावना बनी और कीमतें नीचे आ गईं।

Q2. IEA क्या है और इसका क्या काम है?
IEA यानी इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो ऊर्जा सुरक्षा, तेल आपूर्ति और वैश्विक ऊर्जा नीति से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। इसका मुख्यालय पेरिस में है।

Q3. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का पेट्रोल-डीजल पर क्या असर होगा?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं तो इसका असर धीरे-धीरे पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

Q4. ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड क्या होते हैं?
ब्रेंट क्रूड और WTI दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय तेल बेंचमार्क हैं जिनके आधार पर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत तय होती है।

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Jiya lal verma

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