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Insurance Claim Court Verdict: बीमा कंपनी की मनमानी पर अदालत की सख्ती, ग्राहक को अब मिलेगा पूरा पैसा ब्याज सहित

Insurance Claim Court Verdict: बीमारी किसी को देखकर नहीं आती। जब अचानक कोई अपना अस्पताल के बेड पर होता है, तो परिवार की सबसे बड़ी चिंता उसकी जान बचाने की होती है, न कि पैसों की। इसी भरोसे पर लोग सालों तक हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम भरते रहते हैं। लेकिन जब वही बीमा कंपनी मुश्किल वक्त में कागजों और शर्तों की आड़ लेकर पीछे हट जाए, तो इंसान खुद को बेहद असहाय महसूस करता है। चंडीगढ़ से सामने आए एक ताजा मामले में Insurance Claim Court Verdict ने ऐसे ही व्यवहार पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ संदेश दिया है कि अब ग्राहक को यूं ही गुमराह नहीं किया जा सकता।

यह फैसला केवल एक परिवार के लिए राहत नहीं बना, बल्कि देशभर के उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो कभी न कभी बीमा कंपनी की चालाकी का शिकार होते हैं।

मामला कैसे शुरू हुआ

चंडीगढ़ निवासी एक व्यक्ति ने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस की “फैमिली हेल्थ ऑप्टिमा” पॉलिसी ली थी। जुलाई 2021 में उन्होंने करीब 22,875 रुपये प्रीमियम भरकर पॉलिसी को रिन्यू कराया। पॉलिसी में 10 लाख रुपये का बेस कवर और बोनस के साथ अच्छा खासा मेडिकल सुरक्षा कवच था। उन्हें पूरा भरोसा था कि यदि कभी इलाज की जरूरत पड़ी तो कंपनी उनके साथ खड़ी होगी।

जुलाई 2022 में अचानक उनकी पत्नी को गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो गई और कानपुर के एक अस्पताल में उन्हें बेरिएट्रिक सर्जरी करानी पड़ी। इलाज में कुल खर्च लगभग 2.25 लाख रुपये आया। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद पूरा बिल बीमा कंपनी को भेजा गया।

जब बीमा कंपनी ने भरोसा तोड़ा

कुछ समय बाद कंपनी का जवाब आया और यहीं से परेशानी शुरू हुई। बीमा कंपनी ने 2.25 लाख रुपये के क्लेम में से केवल 69,958 रुपये पास किए और बाकी करीब 1.55 लाख रुपये काट लिए। वजह बताई गई — पॉलिसी की कुछ शर्तें और एक्सक्लूजन क्लॉज।

परिवार हैरान था क्योंकि उन्हें कभी ऐसी किसी शर्त की जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने कई बार कंपनी से संपर्क किया, कागजात भेजे, फोन किए, लेकिन हर बार उन्हें यही बताया गया कि भुगतान “नियमों के अनुसार” हुआ है।

जब कहीं से सुनवाई नहीं हुई तो आखिरकार उन्होंने चंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।

कोर्ट में क्या हुआ

कोर्ट में बीमा कंपनी ने दलील दी कि ग्राहक ने पॉलिसी लेते समय सभी शर्तें पढ़कर स्वीकार की थीं और कंपनी ने नियमों के अनुसार ही भुगतान किया है। लेकिन जब आयोग ने दस्तावेजों की जांच की तो कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि पॉलिसी बेचते समय ग्राहक को इन कटौतियों से जुड़ी शर्तें ठीक से समझाई गई थीं या उन पर ग्राहक के हस्ताक्षर कराए गए थे।

यहीं से Insurance Claim Court Verdict की दिशा तय हो गई।

अदालत का सख्त रुख

आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध “अत्यधिक अच्छे विश्वास” पर आधारित होता है। इसका मतलब है कि कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह ग्राहक को हर जरूरी शर्त पहले ही स्पष्ट रूप से बताए। बाद में उन्हीं छिपी हुई शर्तों का हवाला देकर क्लेम काटना सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ग्राहक को किसी शर्त की जानकारी नहीं दी गई है, तो उस शर्त के आधार पर पैसा काटना पूरी तरह गलत है।

अंतिम फैसला

अदालत ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह काटी गई रकम 1,55,042 रुपये ग्राहक को लौटाए। इस राशि पर शिकायत दर्ज कराने की तारीख 9 अगस्त 2023 से लेकर भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा। इसके अलावा मानसिक पीड़ा और कानूनी खर्च के लिए 20,000 रुपये अलग से देने का आदेश दिया गया। यह पूरा भुगतान 45 दिनों के भीतर करना होगा।

यह Insurance Claim Court Verdict बीमा सेक्टर के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है।

आम लोगों के लिए बड़ा संदेश

यह फैसला साबित करता है कि यदि ग्राहक अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो तो न्याय जरूर मिलता है। यह मामला हर उस व्यक्ति को हिम्मत देता है जिसने कभी बीमा कंपनी के साथ अन्याय महसूस किया हो।

निष्कर्ष

यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि भरोसे की जीत है। Insurance Claim Court Verdict ने यह दिखा दिया है कि कानून आम आदमी के साथ है और जो कंपनियां ग्राहकों के विश्वास से खेलेंगी, उन्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।https://www.bhaskar.com/utility/suvidha/news/the-company-also-has-to-pay-damages-for-the-services-lapse-126321783.html

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