दिल और किडनी शरीर के दो बेहद जरूरी अंग हैं और दोनों का काम अलग होने के बावजूद इनके बीच गहरा संबंध होता है। हमारा दिल खून को पूरे शरीर में पहुंचाने का काम करता है, जबकि किडनी खून को छानकर शरीर से बेकार पदार्थ, अतिरिक्त पानी और जरूरत से ज्यादा नमक बाहर निकालने में मदद करती है। इसलिए जब दिल की कार्यक्षमता कमजोर होने लगती है, तो उसका असर किडनी पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर हार्ट फेलियर से जूझ रहे लोगों में किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि हार्ट फेलियर में किडनी को कैसे बचाएं और दोनों अंगों को स्वस्थ रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखें। इसी तरह अगर किडनी लंबे समय तक ठीक से काम न करे, तो इसका दबाव हृदय पर भी पड़ सकता है।
शरीर में दिल और किडनी लगातार मिलकर काम करते हैं। दिल जब पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप करता है, तो किडनी तक भी जरूरी मात्रा में रक्त पहुंचता रहता है। किडनी इसी रक्त को फिल्टर करके शरीर में जमा अतिरिक्त पानी, सोडियम और दूसरे अपशिष्ट पदार्थों को पेशाब के माध्यम से बाहर निकालती है। लेकिन जब किसी कारण से दिल की पंपिंग क्षमता कम हो जाती है, तो किडनी तक पहुंचने वाला रक्त कम हो सकता है। ऐसी स्थिति में किडनी के लिए सामान्य तरीके से फिल्टरिंग करना मुश्किल हो सकता है।
इसके उलट, यदि किडनी की कार्यक्षमता कमजोर हो जाए, तो शरीर में अतिरिक्त पानी और सोडियम जमा हो सकता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है और हृदय को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इसी वजह से डॉक्टर हृदय और किडनी की बीमारियों को एक साथ ध्यान में रखकर इलाज करते हैं। हार्ट फेलियर और किडनी की बीमारी एक-दूसरे की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।
हार्ट फेलियर का मतलब यह नहीं होता कि दिल पूरी तरह काम करना बंद कर चुका है। इसका अर्थ यह है कि दिल शरीर की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पा रहा है। जब हृदय की पंपिंग क्षमता घटती है, तो शरीर के कई अंगों तक रक्त की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। किडनी भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब किडनी को रक्त की आपूर्ति कम महसूस होती है, तो शरीर ऐसी प्रतिक्रिया कर सकता है जिससे पानी और सोडियम शरीर में अधिक मात्रा में रुकने लगते हैं। शरीर की यह प्रतिक्रिया सामान्य परिस्थितियों में रक्त की कमी से निपटने में मदद करती है, लेकिन हार्ट फेलियर में यही प्रक्रिया परेशानी बढ़ा सकती है। शरीर में अतिरिक्त तरल जमा होने पर पैरों और टखनों में सूजन आ सकती है। कुछ लोगों के पेट में भी पानी जमा हो सकता है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है।
यदि यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो किडनी की काम करने की क्षमता कम हो सकती है। अचानक किडनी की कार्यक्षमता खराब होने की स्थिति को एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) कहा जाता है। वहीं, लंबे समय तक किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती रहे तो इसे क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) कहा जाता है।
जब हृदय और किडनी की बीमारी एक-दूसरे को प्रभावित करती है, तो इस संबंध को चिकित्सा की भाषा में कार्डियोरेनल सिंड्रोम कहा जाता है। इसमें समस्या केवल एक अंग तक सीमित नहीं रहती। दिल की खराबी किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है और किडनी की बीमारी हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
कार्डियोरेनल सिंड्रोम के अलग-अलग प्रकार बताए गए हैं। इनमें कुछ स्थितियां अचानक विकसित होती हैं, जबकि कुछ समस्याएं लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के कारण धीरे-धीरे बढ़ती हैं। उदाहरण के लिए, गंभीर हार्ट फेलियर के दौरान किडनी की कार्यक्षमता अचानक गिर सकती है। दूसरी ओर, लंबे समय से मौजूद हृदय रोग किडनी को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी कारण हार्ट फेलियर के मरीज की देखभाल करते समय केवल हृदय की जांच करना पर्याप्त नहीं माना जाता। डॉक्टर जरूरत के अनुसार किडनी की कार्यक्षमता, ब्लड प्रेशर, शरीर में मौजूद तरल की मात्रा और खून-पेशाब से जुड़ी जांचों पर भी नजर रखते हैं।
हार्ट फेलियर के दौरान किडनी पर कई तरह से असर पड़ सकता है। सबसे आम समस्या शरीर में अतिरिक्त पानी और सोडियम जमा होने की होती है। इसके कारण पैरों, टखनों या शरीर के दूसरे हिस्सों में सूजन दिखाई दे सकती है। कुछ लोगों में थोड़े समय के अंदर वजन भी बढ़ सकता है। यह बढ़ा हुआ वजन हमेशा शरीर में चर्बी बढ़ने के कारण नहीं होता, बल्कि कई बार अतिरिक्त पानी जमा होने से भी ऐसा हो सकता है।
अगर शरीर में तरल पदार्थ बहुत अधिक जमा हो जाए, तो सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। ब्लड प्रेशर में भी बदलाव हो सकता है। किडनी पर लंबे समय तक दबाव बना रहने पर उसकी फिल्टर करने की क्षमता कम हो सकती है। जिन लोगों को पहले से किडनी की बीमारी, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है, उनमें विशेष निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि हर हार्ट फेलियर मरीज में किडनी की समस्या एक जैसी नहीं होती। बीमारी की गंभीरता, उम्र, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, पहले से मौजूद किडनी की स्थिति और इस्तेमाल की जा रही दवाओं जैसे कई कारण इसका असर तय करते हैं।
हार्ट फेलियर में किडनी को बचाने के लिए सबसे पहले हृदय की बीमारी को अच्छी तरह नियंत्रित रखना जरूरी है। डॉक्टर ने जो दवाएं लिखी हैं, उन्हें निर्धारित समय पर लेना चाहिए और बिना सलाह के दवा बंद नहीं करनी चाहिए। हार्ट फेलियर के इलाज में मरीज की स्थिति के अनुसार कई तरह की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ मरीजों को ARBs, ACE inhibitors, ARNIs, beta blockers, mineralocorticoid receptor antagonists या SGLT2 inhibitors जैसी दवाएं दी जा सकती हैं। इन दवाओं का चुनाव मरीज की बीमारी, ब्लड प्रेशर, किडनी की स्थिति और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की दवा देखकर उसे खुद से शुरू करना सही तरीका नहीं है।
SGLT2 inhibitors कुछ हार्ट फेलियर मरीजों में हृदय और किडनी दोनों के लिए लाभ पहुंचा सकते हैं। लेकिन इनका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और उचित जांच के बाद ही किया जाना चाहिए। इसी तरह ARBs या अन्य दवाओं की मात्रा भी मरीज की स्थिति के अनुसार तय होती है।
अगर हार्ट फेलियर के कारण शरीर में अतिरिक्त पानी जमा हो रहा हो, तो डॉक्टर डाइयूरेटिक दवाएं यानी पानी की दवाएं दे सकते हैं। इन दवाओं से अतिरिक्त तरल पदार्थ पेशाब के जरिए बाहर निकालने में मदद मिलती है। लेकिन इनकी मात्रा खुद से बढ़ाना या कम करना नुकसानदायक हो सकता है। जरूरत से ज्यादा दवा लेने पर शरीर में पानी की कमी, ब्लड प्रेशर कम होने या किडनी की कार्यक्षमता में बदलाव जैसी समस्या हो सकती है।
हार्ट फेलियर के साथ कई मरीजों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी समस्याएं भी होती हैं। अगर इन बीमारियों को लंबे समय तक नियंत्रित न रखा जाए, तो किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए दिल के साथ-साथ इन स्वास्थ्य समस्याओं का सही प्रबंधन भी जरूरी है।
हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना, ब्लड शुगर की नियमित जांच कराना और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं समय पर लेना किडनी की सुरक्षा में मदद कर सकता है। भोजन में नमक की मात्रा को लेकर भी सावधानी जरूरी है। अधिक नमक शरीर में पानी रोक सकता है। हालांकि नमक और तरल पदार्थ की सही मात्रा हर मरीज के लिए समान नहीं होती, इसलिए डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
हार्ट फेलियर वाले मरीजों में डॉक्टर समय-समय पर किडनी की स्थिति जानने के लिए कुछ जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। खून में क्रिएटिनिन की जांच और eGFR से किडनी की फिल्टर करने की क्षमता के बारे में जानकारी मिल सकती है। इसके अलावा पेशाब की जांच से भी किडनी से संबंधित महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।
अगर मरीज की दवाओं में बदलाव किया गया हो, शरीर में सूजन बढ़ रही हो या स्वास्थ्य में कोई नया बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो डॉक्टर कुछ जांच दोबारा कराने की सलाह दे सकते हैं। नियमित निगरानी का फायदा यह है कि किडनी की कार्यक्षमता में होने वाले बदलाव को समय रहते पहचाना जा सकता है।
हार्ट फेलियर के मरीज को अपने शरीर में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। अचानक वजन बढ़ना, पैरों या टखनों में पहले से ज्यादा सूजन, सामान्य से अधिक सांस फूलना, लेटने पर सांस लेने में परेशानी, असामान्य कमजोरी या पेशाब में स्पष्ट बदलाव जैसे लक्षणों की जानकारी डॉक्टर को देनी चाहिए।
अगर सांस लेने में बहुत ज्यादा दिक्कत हो, सीने में तेज दर्द हो, बेहोशी जैसी स्थिति बने या स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ रहा हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। ऐसी स्थिति में घर पर अपनी तरफ से दवा की मात्रा बदलना उचित नहीं है।
हार्ट फेलियर और किडनी दोनों को स्वस्थ रखने के लिए नियमित मेडिकल फॉलो-अप जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार भोजन करें और नमक की मात्रा पर ध्यान दें। धूम्रपान से बचें और अगर डॉक्टर ने अनुमति दी है तो अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक गतिविधि करें। रोजाना वजन पर नजर रखना भी कुछ मरीजों के लिए उपयोगी हो सकता है, क्योंकि कम समय में वजन बढ़ना शरीर में तरल जमा होने का संकेत हो सकता है।
दवाओं के मामले में सबसे जरूरी नियम है कि उन्हें अपनी मर्जी से बंद या शुरू न करें। कुछ दवाओं के कारण किडनी की जांच में बदलाव दिखाई दे सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दवा तुरंत बंद कर दी जाए। डॉक्टर जांच रिपोर्ट और मरीज की पूरी स्थिति देखकर तय करते हैं कि दवा जारी रखनी है, उसकी मात्रा बदलनी है या इलाज में कोई दूसरा बदलाव करना है।
दिल और किडनी के बीच मजबूत संबंध होने के कारण एक अंग की बीमारी दूसरे अंग को भी प्रभावित कर सकती है। हार्ट फेलियर में किडनी पर असर कम रक्त प्रवाह, शरीर में पानी और सोडियम जमा होने तथा हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी दूसरी समस्याओं के कारण बढ़ सकता है। समय पर जांच और सही उपचार से कई जटिलताओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
अगर आपको हार्ट फेलियर है, तो केवल हृदय की दवाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार किडनी की कार्यक्षमता, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की भी निगरानी करते रहें। दवाएं समय पर लें और शरीर में सूजन, अचानक वजन बढ़ने, पेशाब में बदलाव या सांस फूलने जैसे संकेतों को नजरअंदाज न करें। हार्ट फेलियर में किडनी को कैसे बचाएं, इसका इलाज हर मरीज के लिए उसकी मेडिकल स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए दवा, नमक या पानी की मात्रा में कोई भी बदलाव अपने डॉक्टर की सलाह के बाद ही करें।
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