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रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बना—अमेरिकी दबाव के बावजूद ऊर्जा नीति कायम

विश्व ऊर्जा बाज़ार पिछले कुछ वर्षों में बड़े उतार-चढ़ाव से गुज़र रहा है, लेकिन इसके बीच भारत ने अपनी दिशा स्पष्ट रखी है। देश की ज़रूरतें बढ़ती जा रही हैं और इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किफायती और स्थिर तेल सप्लाई बहुत जरूरी है। ऐसी स्थिति में रूस भारत के लिए एक अहम आपूर्ति स्रोत बन गया है। ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बनकर उभरा है। यह उपलब्धि तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब अमेरिका लगातार अन्य देशों पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बना रहा है। इसके बावजूद, भारत ने राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कदम उठाए हैं।

अक्टूबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा भारत का रूसी तेल आयात

अक्टूबर के आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत ने रूस से लगभग 2.5 बिलियन डॉलर मूल्य का कच्चा तेल खरीदा। यह खरीद दिखाती है कि भारत रूसी तेल को केवल एक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा मानता है। रूस द्वारा दी जाने वाली रियायती कीमतें और स्थिर सप्लाई ने भारतीय रिफाइनरियों को रूस पर और निर्भर बना दिया है। इसी वजह से आज रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत वैश्विक ऊर्जा व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इसके साथ ही भारत ने ऊर्जा क्षेत्र के कई और हिस्सों में रूस को प्रमुख स्रोत के रूप में अपनाया है। भारत ने केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि कोयला और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की भी बड़ी मात्रा रूस से आयात की। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने अक्टूबर में लगभग 351 मिलियन डॉलर का कोयला और करीब 222 मिलियन डॉलर के रिफाइन्ड ऑयल प्रोडक्ट्स खरीदे। यह दिखाता है कि भारत के लिए रूस एक संपूर्ण ऊर्जा साझेदार बन गया है। ऐसे में रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत की स्थिति और मजबूत होती दिख रही है।

चीन को पीछे छोड़कर भारत की ऊर्जा रणनीति ने बढ़ाई रूस पर निर्भरता

दूसरी तरफ, चीन अभी भी रूस का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है और उसने अक्टूबर में 3.7 बिलियन डॉलर से अधिक का तेल खरीदा। चीन ने लगभग 760 मिलियन डॉलर मूल्य का कोयला भी रूस से आयात किया। इन दोनों एशियाई देशों की बढ़ती खरीद से यह साफ है कि रूस के लिए एशिया एक मजबूत और स्थिर बाज़ार बन चुका है। वहीं भारत के मामले में कई ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बने रहने की संभावना काफी अधिक है।

वहीं यूरोप और तुर्की भी रूस के ऊर्जा निर्यात में बड़े खिलाड़ी के रूप में बने हुए हैं। यूरोपीय देशों ने अक्टूबर में लगभग 824 मिलियन डॉलर मूल्य की LNG और गैस रूस से खरीदी। तुर्की ने करीब 957 मिलियन डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए। ऊर्जा की वैश्विक जरूरतें इस बात को साबित करती हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद रूस आज भी कई देशों की ऊर्जा व्यवस्था का हिस्सा बना हुआ है।

अमेरिका के दबाव और प्रतिबंधों के बीच भारत का संतुलित रुख

अमेरिका, खासतौर पर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन, बार-बार यह दावा करता रहा है कि रूस से तेल खरीदकर देश मॉस्को को आर्थिक सहायता दे रहे हैं। इसी कारण अमेरिका ने Rosneft और Lukoil जैसी रूसी तेल कंपनियों पर सख्त प्रतिबंध लगाए। यह उम्मीद थी कि इन प्रतिबंधों का असर भारत पर भी पड़ेगा और वह अपनी खरीद कम करेगा। लेकिन अक्टूबर के आँकड़े बताते हैं कि भारत ने अमेरिकी दबाव को अपनी नीति पर हावी नहीं होने दिया। इस वजह से आज भी रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बना हुआ है।

हालांकि आने वाले महीनों में कुछ भारतीय कंपनियों की रणनीति में बदलाव देखा जा रहा है। रिलायंस, HPCL, BPCL, MRPL और HMEL जैसी कंपनियों ने दिसंबर की डिलीवरी के लिए रूस से नए ऑर्डर नहीं दिए। इसके अलग-अलग कारण हैं—समुद्री बीमा की शर्तें, कीमतों में उतार-चढ़ाव और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ। दूसरी तरफ, इंडियन ऑयल और नयारा एनर्जी अभी भी रूस से तेल खरीदना जारी रखे हुए हैं।

भारत के वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर कदम और भविष्य की रणनीति

भारत किसी एक देश पर ऊर्जा के लिए निर्भर नहीं रहना चाहता। इसी कारण इंडियन ऑयल ने जनवरी–मार्च के लिए करीब 2.4 करोड़ बैरल तेल की खरीद के नए टेंडर जारी किए हैं। हिंदुस्तान पेट्रोलियम भी अमेरिका और पश्चिम एशिया से तेल खरीदने की योजना बना चुका है। सऊदी अरब और यूएई ने भी भारत को स्थिर सप्लाई का भरोसा दिया है। इस तरह भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बहुआयामी बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

इसके बावजूद, ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि रूस आकर्षक दामों पर तेल देता रहा तो आगे भी रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बना रहेगा। जबकि अमेरिका द्वारा लगाया गया 50% टैरिफ और पेनल्टी अक्टूबर तक भारत की खरीद पर विशेष असर नहीं डाल पाए हैं।

निष्कर्ष: रूस-भारत ऊर्जा साझेदारी लंबे समय तक बनी रह सकती है

कुल मिलाकर भारत की ऊर्जा नीति यह दिखाती है कि देश किसी भी बाहरी दबाव के बजाय अपनी घरेलू आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता है। रूस से मिलने वाला सस्ता और स्थिर तेल भारत के लिए अत्यंत लाभकारी है। यही कारण है कि आज रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बन चुका है, और निकट भविष्य में भी भारत इस स्थिति को बनाए रख सकता है।https://hindi.etnownews.com/economy/india-s-spend-on-russian-oil-buy-

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Jiya lal verma

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