साल 2025 के ताजा आंकड़े यह दिखाते हैं कि कड़े आयात शुल्क लगाने के बावजूद अमेरिका का व्यापार घाटा अभी भी 901 अरब डॉलर के पार बना हुआ है। राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा लागू की गई ट्रंप टैरिफ नीति 2025 का उद्देश्य विदेशी सामान पर निर्भरता कम करना और घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाना था। हालांकि, वास्तविक नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे।
यदि 2024 के आंकड़ों से तुलना करें, तो उस वर्ष व्यापार घाटा लगभग 904 अरब डॉलर था। इसका मतलब है कि सख्त नीतियों के बावजूद कुल घाटे में केवल मामूली कमी आई है। यह स्थिति बताती है कि वैश्विक व्यापार की संरचना इतनी जटिल है कि सिर्फ टैरिफ बढ़ाकर संतुलन बनाना आसान नहीं है।
चीन पर टैरिफ लगाने से द्विपक्षीय व्यापार में कमी जरूर आई। चीन के साथ व्यापार घाटा लगभग 32 प्रतिशत घटकर 202 अरब डॉलर तक आ गया। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी आयातकों ने चीन से खरीद घटाई है।
लेकिन व्यापक तस्वीर देखें तो अमेरिका की कुल आयात आवश्यकता में खास गिरावट नहीं आई। अमेरिकी बाजार को इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और उपभोक्ता उत्पादों की लगातार जरूरत रहती है। जब चीन से आयात कम हुआ, तो उसकी भरपाई अन्य देशों से होने लगी। यानी समस्या का रूप बदला, पर उसका आकार लगभग वही रहा।
टेक्नोलॉजी क्षेत्र में तेज बदलाव ने भी अमेरिका का व्यापार घाटा प्रभावित किया है। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार ने एआई चिप्स आयात को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी टेक कंपनियां अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स पर निर्भर हैं, जिनका उत्पादन एशिया में बड़े पैमाने पर होता है।
ताइवान इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेष रूप से Taiwan Semiconductor Manufacturing Company जैसी कंपनियां दुनिया की प्रमुख टेक फर्मों को उन्नत चिप्स उपलब्ध कराती हैं। इसी वजह से ताइवान के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़कर 147 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो पहले की तुलना में काफी अधिक है।
यह रुझान दिखाता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की जरूरतें टैरिफ नीति से कहीं ज्यादा ताकतवर साबित हो रही हैं।
चीन पर बढ़े शुल्क के बाद कई कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन में बदलाव किया। उत्पादन इकाइयों को मेक्सिको और वियतनाम जैसे देशों में स्थानांतरित किया गया। परिणामस्वरूप, मेक्सिको के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 197 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पहले 172 अरब डॉलर था।
वियतनाम के साथ भी व्यापार असंतुलन में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिकी कंपनियां टैरिफ से बचने के लिए नए उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं। हालांकि, इससे कुल आयात में गिरावट नहीं आई, बल्कि उसका भौगोलिक स्वरूप बदल गया।
दूसरी ओर, कनाडा के साथ व्यापार घाटा घटकर 46 अरब डॉलर पर आ गया, जिससे थोड़ी राहत मिली है।
जहां वस्तुओं के व्यापार में दबाव बना रहा, वहीं सेवाओं के क्षेत्र ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और पर्यटन में अमेरिका ने 339 अरब डॉलर का सरप्लस दर्ज किया, जो पिछले वर्ष 312 अरब डॉलर था।
यह वृद्धि बताती है कि अमेरिकी सेवा क्षेत्र अब भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है। विशेष रूप से वित्तीय सेवाएं और डिजिटल समाधान अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत मांग बनाए हुए हैं। हालांकि, यह सरप्लस वस्तुओं के भारी घाटे की पूरी भरपाई नहीं कर पा रहा।
मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और एयरक्राफ्ट जैसे क्षेत्रों में व्यापार घाटा 2 प्रतिशत बढ़कर 1.24 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। वर्ष की शुरुआत में टैरिफ लागू होने की आशंका के चलते कई आयातकों ने पहले ही बड़ी मात्रा में सामान मंगा लिया था।
इस अग्रिम आयात के कारण शुरुआती महीनों में घाटा और ज्यादा दिखाई दिया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नीतिगत बदलावों की घोषणा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर सकती है।
अक्सर यह माना जाता है कि आयात शुल्क का भुगतान विदेशी कंपनियां करती हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि शुल्क अमेरिकी आयातक देते हैं। बाद में यह अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं तक पहुंच सकती है, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना रहती है।
हालांकि महंगाई उतनी तेज नहीं बढ़ी जितनी आशंका जताई गई थी, फिर भी दीर्घकाल में इसका प्रभाव उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ सकता है।
ट्रंप टैरिफ नीति 2025 ने चीन के साथ व्यापार में कमी जरूर की है, लेकिन समग्र रूप से अमेरिका का व्यापार घाटा अभी भी बहुत ऊंचे स्तर पर है। इससे यह स्पष्ट है कि केवल आयात पर टैक्स बढ़ाना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।
वैश्विक सप्लाई चेन लचीली है और कंपनियां जल्दी नए विकल्प खोज लेती हैं। ऐसे में व्यापार संतुलन के लिए बहुआयामी रणनीति की जरूरत है, जिसमें घरेलू उत्पादन, तकनीकी निवेश और व्यापारिक साझेदारी शामिल हों।
फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यही संकेत देते हैं कि सख्त टैरिफ के बावजूद अमेरिका को अपने व्यापार घाटे की चुनौती से पूरी तरह राहत नहीं मिली है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नीति निर्माता इस जटिल आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए कौन से नए कदम उठाते हैं।
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